Monday, February 6, 2023
विलुप्ति
Saturday, October 8, 2022
बिखराव
बिखराव
बिखराव
Sunday, July 24, 2022
एक कदम
एक कदम
एक कदम
संगीत की धुन
समय के साथ
आनंद
Wednesday, July 20, 2022
प्रतिक्षा
प्रतिक्षा
Photo credit... Artra Beginnings
प्रतिक्षा
Saturday, May 29, 2021
पहाड़ से दिन
पहाड़ से दिन
Sunday, March 7, 2021
जिंदगी
जिंदगी
जिंदगी
स्वपन
Thursday, September 10, 2020
गुलाब
गुलाब
गुलाब
मेरी मालन...!
क्या लाई हो आज, दोपहर के खाने में...
और क्यों ? तुम मेरे लिए...
एक कोमल पुष्प, बगिया से तोड़ लाती हो...
रोज़ाना ही....
कहां संभाल पाऊंगा मैं इनकी ख़ुशबू....
तुम ही तुम तो रहती हो...
मेरे हृदय और मस्तिष्क में...
अरे वाह !...'खीर - पुडी'...
कैसे तुम जान जाती हो...
मेरी पसंद ना पसंद...
मेरे प्रीतम...
तुम्हें याद है ना!
तुम्हें गुलाब और इनकी महक कितनी पसंद थी...
के तुम मेरी बगिया के रस्ते आ जाया करते थे...
हर रोज़ ही...
इन्हीं गुलाबों की देन तो है...
हमारा प्रेम प्रसंग और हमारा ये मिलाप...
कहीं ये गुलाब बुरा ना मान जाएं...
इसीलिए मैं रखती हूं इन्हें, हमारी मुलाकातों के बीच...
ताकि महकता रहे हमारा प्रेम...
चलो अब...खीर खालो !!
(c)@ Roop Singh 10/09/20
इत्र
इत्र की महकें तो बहुत देखी..
मोगरे ,गुलाब, चम्पा चमेली की...
कुछ तो पहली बारिश की माटी की सौन्ध जैसी भी...
पर कुछ और भी हैं, जिनका भी कोई जबाब नहीं...
यहाँ मैं तुम्हारी बांहों की बात नहीं करूंगा...
बात करूंगा तुम्हारी यादों की, वो भी बड़ी गज़ब महकतीं हें...
जब भी मैं होता हूं एकांत में, तब तो और भी गज़ब...
वैसे पुरानी किताबें भी अपनी एक अलग सुगंध रखती हैं...
जिनका भी कोई मुकाबला नहीं है....
(c) @ Roop Singh 03/08/21
Wednesday, August 12, 2020
छतरी
छतरी
पुरानी चीजें
Saturday, June 6, 2020
सावन
सावन
Photo credit..Roop Singh
सावन
कब तक ना आती आखिर
बरस मेरी रूह पर
बदलाव
Friday, May 8, 2020
अर्थ
अर्थ
अर्थ
मंथन
पर व्यक्तिगत रूप से इंसान की प्रकृति ऐसी है । कि ! उसे अपने आप में शांत और संतुष्ट होने की एक चाह तो होती है। पर वह हमेशा भटकाव और अस्थिरता का चुनाव ज्यादातर करता है। इसके अनेक कारण वर्णित है किताबों, काव्यों, ग्रंथो आदि में। मुख्य वजह उसकी अपनी लालसा हो सकती है और आज के दौर में तो इंसान का जो व्यावसायिक आधुनिकरण हुआ है, उसके चलते कई और कारण भी जुड़ गए है। चाहे ना चाहे भी इंसान उलझनों को न्यौता दे देता या उनमें फंस जाता है। जंहा उसे मानसिक तनाव से भी गुजरना होता है। और कई बार अवसाद इंसान के दिल दिमाग में घर कर जाता है। इसकी भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अवसाद का बुरा प्रभाव शरीर पर भी होता है। दिनचर्या , खानपान , निंद्रा आदि में होने वाले बदलावों के कारण।
इसलिए इंसान को चाहिए कि सुलझा हुआ रहे, सहज रहे और सरल रहने की कोशिश करे। अब सवाल उठता है कैसे ?
तो देखिए! इंसान की मूल जरूरतें इतनी भी नहीं की जितनी चीजों के पीछे आज इंसान भागता है। और एक ऐसे चक्र में स्वयं को फसा लेता है। जहां वह स्वयं को जीना भूल जाता है, समय का सही उपयोग किए बिना उसे गुजरने देता है। इंसान होने की मौलिकता से कट जाता है। यहां बदलाव लाने की बहुत गुंजाइश है और जिन्हे लाना चाहिए। केवल भाग्य का ठीकरा फोड़ कर स्वयं को अलग नहीं किया जा सकता, इस बात से जो असल में इंसान के जीवन के लिए सहायक है।
इसलिए बहुत जरूरी है इंसान को अपनी सही क्षमता और पसंद की पहचान करके, उसके अनुरूप ही काम और लक्ष्य का चुनाव करना चाहिए। ताकि काम, तनाव का कारण कम बने। और जब काम पसंद का होगा तो काम में मन भी लगेगा ।
साथ ही अपने रिश्तों को, परिवार को , मित्रो आदि को भी समय देना चाहिए जिससे ना केवल प्रेम की प्रगाड़ता बढ़ती है, साथ ही अकेलेपन के अवसाद से भी इंसान बच जाता है । और आत्मबल भी बढ़ता है।
यहां सुलझे और सहज रहने से यही पर्याय है। की अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए। सरल रहे, खुश रहे, मुस्कुराते रहे ।
तर्क और बातों का कोई अंत नहीं । सुख और दुख एक हिस्सा है जीवन का । दोनों ही स्थितियों में एक सुलझा हुआ इंसान ही सुख का सही आनंद ले सकता है और दुःख से उबर सकता है। जीवन बहुत अनमोल और महत्वपूर्ण है। इसका सम्मान होना ही चाहिए।
Roop Singh 10/05/2020














