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Saturday, July 19, 2025

उपकार

 उपकार

         
                    photo credit @ Roop Singh 

उपकार


उपकार न समझ , मेरे मालिक तू इसे....
जो ये , तू  मुझपे किये जाता है. ....

क्या जाने ?
मैं तुझे इसका मोल कभी चुकादूं  ....!!
या जाने, तू ही श्रण किसी पूर्व जन्म  का चुकाए जाता है. ..!!

चाहे जो भी हो....

पर मुझे तो उपकार का पर्याय श्रण ही लगता है. ..

या इसे, एक मीठा एहंकार भी कह सकते हें क्या ?

तुम ही विचार करके बताना मुझे...
मेरे मालिक...!!

क्या उपकार शब्द , उपयोग के लिए ठीक है. ....!!

(c)  @ Roop Singh 21/10/2023


      

                 photo credit @ Roop Singh 
                       (window in clouds) 

                                     full pic 


लेखक


लेखक



के यूं भी, मैं एक लेखक हुआ....
बहोत कुछ सुना और  पढ़ा. ...

पर पाया ! कोई भी शब्द, मेरी पीड़ा...?
मेरा आपा

नहीं ! बयां कर पा रहे हैं . .....

तब मैंने खुद ही, अपनी कहानी...!
अपनी जुबानी....!!
जो, लिखने का फैसला किया


और ! जो,  लिखना  शुरु किया...
तब! ना जाने कब मैं लेखक हो गया....

बस लिखते लिखते....
 
(c) @ Roop Singh 19/07/2025



Wednesday, July 9, 2025

पृथ्वी मेरी माँ

पृथ्वी मेरी माँ 

                    Photo credit @ Roop Singh 


पृथ्वी मेरी माँ 


ओ! मेरी पृथ्वी,  मेरी माँ ...!
तेरे गर्भ से जनमा, ये संसार ...!!
संपूर्ण वनस्पति, संसाधन हजार...!!
भला! होगा कौन अभागा, जिसे ना हो तुझसे प्यार...!!

कण - कण है तेरा जैसे माणिक..!
अमृत की तुझमे बहती, धाराएं कल कल..!
देखो !अम्बर भी तारों संग तुझ्से गौरान्वित..!!
गृह नक्षत्र ओर भानू, तुझपे नैन धरे हे पल पल !!

तेरे परबतों की चोटियां,  आकाश को छू जाती है! 
दुर्बलो को जैसे , साहस से जीना सिखलाती है  !!

समंदर की लेहरों में उठता है,  कैसा माधुर संगीत...!
के,  सुगंधित पवन तो जैसे होई जाये मूर्छित. ..!!

पाख पाखेरु तुझसे हर्षित ।
जीव जंतु सब तुझसे ही पोषित...!!

मानव जाति का तुमसे है कल्याण !
भला होगा कौन अभागा,  जो धरे ना तेरा ध्यान !!

ओ मेरी पृथ्वी मेरी माँ 
तेरी जय हो, जय हो,  जय हो 

(c) @ Roop Singh 22/04/2017


                  Photo credit @ Roop Singh 



 " पृथ्वी मेरी मां "

जब मैं थका हारा
धरा पर कान लगाए
सो जाता हूं बिना बिछौना
तब मैं ! 
निंद्राचित स्वपनलोक में भी सुन पाता हूं
ध्वनि तेरे घ्रूमण की
जैसे तू हो
मेरी निशा की लोरी मां ।।

c@ Roop Singh 29/07/19

Tuesday, February 25, 2025

शिवरात्रि

 शिवरात्रि

                   Photo credit @ Roop Singh 

शिवरात्रि


कांपे धरा, कराहे अम्बर…
करे दानव–देव शिवा शिवा…
उफान समंदर को छूए हिमालय…
मानव–जनावर करे शिवा शिवा…
ब्रह्मा–विष्णु भजे तोहुकु…
नारद–सारद करे शिवा शिवा…

तेरे क्रोध के आगे काल न ठहरे..
धरदो त्रिशूल, महाकाल शिवा….!

नंदी-संदी सब पांव में लोटे…
अरज कर रही गौरा माँ…
गणेश–कार्तिकेयन हाथ जोड़ खड़े हें…
विनत कर रही चहुं दिशा…

शिवा शिवा – शिवा शिवा…
गुरुजन की तो मानो हे नाथ शिवा…
धरदो त्रिशूल शिवरात्रि को ओसर् हे..

करने दो वंदना डूब के धुन में…
शिवा शिवा – शिवा शिवा…..

©@ Roop Singh  07/03/16

हर हर शम्भू ...🙏


कृष्ण

अनंत सारथी माधव गोपाल तू ........!
ओमकार अपार केशव् नन्दलाल तू .!!
अमृत कृष्णा श्रीवत्स कौस्तुभधराय..!
गोविंद ऋषिकेश, दयानिधि दयाल तू !!

(c)  @ Roop Singh 14/03/25

 जय श्री कृष्ण ......🙏

Tuesday, January 7, 2025

पीड़ा

 पीड़ा

                     Photo credit @ Roop Singh 

पीड़ा 


हृदय टूट टूट कर गिरता है...
बड़े सलिखे से...
जैसे गिरता है झरना ...
कभी कभी तो बहुत उँचे से भी...

तब पीड़ा तो बहुत उठती है...
क्या कहते हो ? बहुत उठती होगी ना !...
और उठता है, एक सुर संगीत का भी...
साथ ही साथ....

मधुर ! पर पीड़ा दायक!
जो चीरता है, छाती को....!!
दबे स्वर में. ..!!

वेदना का गुबार..
उठता है दबता है, फिर उठ जाता है...
कंठ भर आता है, गाड़े शहद सा...
नैनो में उमड़ता है सागर ...

और मुख पर देखो ! 
तब भी खिली रहती है एक हंसी...
जो ख़ुशी ख़ुशी विदा लेना चाहती है...
अब भी...!!
इस गहरी उदास कर देने वाली पीड़ा से....!! 

(c) @ Roop Singh 25/03/21


Photo credit @ Roop Singh 

रात


रात हमेशा कोई कहानी सुनाती है. ..!
कभी उदासी तो कभी उल्लास की और जाने क्या क्या...!!
सो भी गये तो क्या, वो सपनो में सुनाएगी कोई कहानी जरूर...!
ये उसकी फितरत है, रात जरूर कोई कोई कहानी सुनाती है....!!

(c) @ Roop Singh  14/12/23

                                    रात

कोई एक खिड़की है...!
जो केवल रात में खुलती है. ......!

जिंदगी से इतर , दुनिया से परे......!!

(c) @ Roop Singh 19/072025


Wednesday, October 16, 2024

बेटी


बेटी

                     Photo credit @ Roop Singh 

बेटी


माँ, जब मैं छोटी थी...
मिट्टी से खेला करती थी...
मिट्टी का घर बनाते वक्त.....
मैंने दर्ज की ! तुम्हारी तकलीफ तुम्हारा डर....

के ! घर, कहीं टूट न जाए ढह न जाए....

आखिर! कितने रखरखाव और मेहनत से....
जोड़े रखती तुम घर को, बचाए रखती तुम घर को....

घर को बचाए रखने और बनाए रखने की,
अहमियत को मैंने समझ लिया था......

बहुत छोटी उम्र में मिट्टी से खेलते - खेलते.....

और अगर ना भी खेली होती मिट्टी से....
तब भी सीख ही जाती....
ये गुण....

कहते हैं ! माँ  के गुण.....
स्वतः ही आ जाते हैं , बेटी मैं.........

(c) @ Roop Singh 15/10/2024

Friday, June 28, 2024

एक बरस बीता

 एक बरस बीता

   
                     photo credit. ....Roop Singh 



एक बरस बीता 


चौमासे ने धो डाले आंगन  से. ..
मां के हाथों से बने रंगोली-मांडुड़े ...
के ! बूढे माँ-बाप को चल बसे...
अब एक बरस बीता..... !!


गाँव की माटी घर के आंगन से उपड़ी. ..
बनकर पपड़ी. ..
और मूसलधार बारिश से...
दहलीज़ पर हो गये कितने छेद. ..!!

बेटा जो परदेस गया था..
वो आखिर कब लौटेगा ..?

के, इंतज़ार रह गया रीता का रीता....
बूढे माँ बाप को चल बसे. ...
एक बरस बीता. ....!!

फूंस के छप्पर में दरारें पड़ गयी...
अब सूरज झाँके , अम्बर ताके. ..

और चूल्हे की भीतें तो राख मे भीतर को ढेह गई ...

यहाँ तक के,मक्के - बाजरे की रोटियों की खुशबू
यादों से भी , संग ले गई चिता....
के, बूढे माँ बाप को चल बसे. ..
एक बरस बीता. ..!!

अब सूने पड़े घर की ,चहल - चमक कौन लौटाए..?
जब अपने ही घर को न बापस, लौट कर अपने आए. ...

वाह रे परदेस..!
कैसी तेरी प्रीती कैसा तेरा नाता...
के जो जाता, फिर ना लौट के आता...!

गांव घर आंगन , अब सूने पन मे जीता...!
के ! बूढे माँ बाप को चल बसे....
अब एक बरस बीता. .....!!

(c) @ Roop Singh 20/09/2018




                   Photo credit @ Roop Singh 



Wednesday, October 11, 2023

असंतुलन

असंतुलन



                  art work by. .....Roop Singh 


असंतुलन 

कुछ भी न होने पर भी,  एक-दो चीजें हैं....
जो स्वाभाविक रूप से रहती है विद्यमान ...

यहां मतलब ! कुछ भी न होने की स्थिति से है .....
रहता है तब!  अंधेरा, समय और रिक्त (आकाश असीमित)...

ये एक विज्ञान की पहेली जैसा है.....
पर, मैं समझता हूं..
सर्वप्रथम ! जब किसीका जन्म हुआ होगा उस शून्य में....
तो जरूर ! वह गणित ही रहा होगा.....
और बाद में निसंदेह ऊर्जा शक्ति भी....

यह तो हुई कुछ भी न होने की स्थिति की बात.....

अब थोड़ी दृष्टि इस भौतिकी पर भी डालते हैं....
चलो मानव जीवन को उदाहरण के लिए लें. ...

आप  देखिए...
यहां सब कुछ होते हुए भी.....
एक तुलनात्मक और असंतुलित समानता दिखती है....
कुछ भी न होने की स्थिति जैसी ही....

दिखता है जीवन में अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा....
समय में, और असमय में भी .....
कितना कुछ होने के बाद भी दिखता है...
केवल नीरस अंधेरा....

और इस प्रकार बना रहता है जीवन में....
रिक्त, रिक्त, रिक्त. ....
विशाल रिक्त अकल्पनीय ब्रह्मांड जैसा....

मान लेता हूं जीवन में विज्ञान अपने ढंग से काम करता रहा होगा.....
पर आप देखिए.....
यहां गणित भी जबरदस्त ढंग से काम करता है.....

के! तर्क - वितर्क चलता ही रहता है.....
मस्तिष्क के पटल पर.....
अनवरत ही. .....

जाने कौन सा समाधान चाहता है, आखिर यह जीवन....
गणित की भाषा में कहूं तो...!
न जाने ! कौन सा हल खोजना चाहता है यह जीवन....

सारी माथा-पच्ची  के बाद...
एक ही निष्कर्ष सही लगता है.....

ऊर्जा को अंततः शून्य  में ही समा जाना चाहिए. ...
हां ! समा जाना चाहिए शून्य मैं ही. .....!!

(c)@ Roop Singh 08/10/23




Sunday, September 3, 2023

कष्ट

 कष्ट



                    Photo credit. ..@ Roop Singh 

कष्ट


उस रोज़ बहुत भयंकर बारिश हुई....
होती भी क्यों नहीं ?
पिछ्ले दो हफ्तों से गर्मी बहुत तेज़ जो थी...

पर शिकायत है मुझे उन बादलों से...
उन्हें नहीं बरसना चाहिए था..
दो दिन और रुक जाते !..

उस बेचारे पर कहर बनकर टूट पड़े...
बेअकल - बेअदब कहीं के...

आखिर जब कोई दुःखी हो..
ये शब्द ठीक नहीं..
हां, जब कोई बहुत पीड़ा में हो...
अत्यंत पीड़ा में...

तब सबको शांत रहना ही चाहिए...
जब तक के पीड़ा का मवाद , बहकर बाहर ना निकल जाए...

मगर बेशर्मी तो देखो...!
छ्प्पर फाड़ बरसा, चूता रहा रात भर...
कहीं सूखा ना छोड़ा बेचारे के घर में...

वो रो लेना चाहता था, जी भर के...
मगर ये बेशर्म , उस अभागे पर भारी रहे ....

उसके रोने के अधिकार की अनदेखी नहीं होनी चाहिए थी...
हे ईश्वर !....
आखिर ! उस दिन, उसने अपना  जवान बेटा खोया था ...!

(c) @ Roop Singh 09/06/21





Photo credit @ Roop Singh 

Monday, February 6, 2023

विलुप्ति

 विलुप्ति 

                      Photo credit...@Roop Singh

विलुप्ति 


क्षण क्षण विलुप्त हो रहा हूं।
कण कण स्वयं से, जैसे मैं मुक्त हो रहा हूं।
प्राची से निशा तक हो रहा हूं।...
भोतिकि से कल्पना तक हो रहा हूं...

हो रहा हूं मुक्त,स्वपन से वास्तविकता तक..
हो रहा विलुप्त अपने अस्तित्व की परिधियों की परिपाटी से...

विलुप्त हो रहा हूं अंतहीन समय में... 
ज्ञान की पराकाष्ठा की ओर...
सुदूर इस माटी से।

हो रहा हूं मुक्त, अपनी भावनाओं से...
अपनी अकांक्षाओं से....
भयभीत कर देने वाली कथाओं से...!

धरा से आकाश की ओर हो रहा हूं...
भूत और भविष्य की सीमा के पार..!
नए किसी आयाम की शिराओं की ओर हो रहा हूं....

तत्त्व से मुक्त हो....!
ऊर्जा पुंज के प्रथम स्रोत की प्राप्ति की
और हो रहा हूँ।....

क्षण क्षण हो रहा हूं, कण कण हो रहा हूं।
मैं विलुप्त हो रहा हूं....
मैं मुक्त हो रहा हूं.....!!

(c) @ Roop Singh 20/10/21

                     Photo credit @ Roop Singh 

Saturday, October 8, 2022

बिखराव


 बिखराव


                         Photo credit.. Roop Singh


बिखराव


जीवन में एक पड़ाव के बाद....
पाता हूं बिखराव ही बिखराव...

बिखराव इतना ...?

के ! बँट गया हूं, असखंय टुकडों में....

अब नहीं दिखता पूरा, मैं किसीको भी...

जिसकी दृष्टि जितने टुकडों पर...
उसे मैं उतना दिखता.....

सब...!
अब शंका से मुझे देखते.....
और यदा-कदा तो कह भी देते...
"तुम हमेशा से, ऐसे तो न थे "....

अब मैं, इस सतहि दृष्टिभ्रम के बारे क्या कहूं.....!

सच तो ये है....
के ! मैं, अब भी वही हूं...
जो मैं हमेशा से था....!!

पर, जब सभीको...
अपने अपने आंकलन से मुझे देखना है....

तब, मुझे तो बँटना ही था...
असखंय टुकडों में...
सो, यूं मेरा बिखराव हुआ....!!

परंतु , यदि कोई झांक सके मेरे भीतर...
तो मैं अब भी वही तो हूं.....
जो मैं था....!!

(c) @ Roop Singh 08/10/22















Sunday, July 24, 2022

एक कदम

एक कदम


Perspective 1....by Roop Singh


एक कदम

मैं जब एक कदम आगे बढ़ााऊं , तो तुम एक कदम पीछे खींचना।
मैं दो कदम पीछे हट जाऊंगा।।

और जब मैं एक कदम पीछे खींचू तो तुम एक कदम आगे मत बढ़ाना।
कहीं में दो कदम आगे ना आ जाऊं।

अगर तुम चाहो के मैं आगे आऊं, तो जरूर एक कदम बढ़ाना ।।

(C) @ Roop Singh 06/07/20




संगीत की धुन

शब्दोंं से ना कहो कोई बात अपनी....
प्रिय !...
किसी संगीत की धुन पर सजा-धजा कर कहो...
के संगीत की धुन, झूमने का अवसर देगी...
शब्द तो केवल बाण चलाते हें....

(c) @ Roop Singh 26/02/21



समय के साथ


यूं तो मुझे पहाड़ बहुत पसन्द है....
पर कहानी पेड़ और शीशे की सुनाता हूं...

शीशा हवा को रोकता है, धूप को नहीं...
और पेड़ धूप को रोकता है, हवा को नहीं...

पहाड़ की अपनी लम्बी कहानी है, कभी और सुनाता हूं....

(c) @ Roop Singh 10/10/22



आनंद

      देखा ! आंखों के सामने धरातल पर बह रहे थे बादल । मूंगफली 
के खेतों जैसे थे ऊँचाई में। हवा सर्र - सर्र चल रही थी । बादलों की नन्ही टुकड़ियां बहे जा रही थी और कर रही थी जैसे हवा का  चित्रण। उसकी उपस्थिति की व्याख्या । हवा का स्पर्श समय के प्रहर  की ओर ध्यान करा रहा था, शायद रात्रि का अंतिम प्रहर था । दृश्य मनोहर! था अती मनोहर ! दूध से धुले नन्हे बादल जैसे सफेद झागदार धुएं के झुंड हो।

        उधर आकाश की और निहारा तो देखा गजब और भी गजब ।बादल तो धरा पर थे पर ऐसा नहीं था के आकाश रीता हो,  सतरंगी पुष्पों से भरा पड़ा था आकाश। आकाश दृश्य बदलते जाता, न जाने कैसे कैसे आकार - आकृतियां धरता। जैसे ब्रह्मांड का सारा संकलन आज आकाश पटल पर उतर आया हो। देखा के कभी सात घोड़ो वाला रथ  निकल रहा है । तो कभी नाच रही है नृत्याँगनाएं । क्षण प्रति क्षण बदलता ही जा रहा है  दृश्य ।  वाह ! आनंद ही आनंद !!

     सब कुछ ठीक था पर यह क्या ? जहां बैठा हूं वहां की स्थिति और  स्थान  सही नहीं लग रहा। एक छटपटाहट है सिंहासन ना होने की । धरा पर  मिट्टी और कंकड़ों पर बैठ दृश्य तो मनोहर लग रहा है ,  परन्तु आनंद अधूरा सा लग रहा है। ध्यान रुक रुक कर चुभते कंकड़ों पर भी जाता है ।

     फिर, बहुत गहन विचार किया । विचार  करके पाया, की जो पूर्ण और अनूकूल स्थिति की चाह है ना यह आनंद का आनंद नहीं लेने देती । वरना आप ही देख लो आनंद ही आनंद तो है।

(c) @ Roop Singh 14/09/23

Wednesday, July 20, 2022

प्रतिक्षा

प्रतिक्षा

Photo credit... Artra Beginnings


प्रतिक्षा


प्रतिक्षा मेरी, कोई प्रतिज्ञा तो नहीं.....
पर हां,  एक कीर्तिमान जैसी है......

तुम ही देखो !......
कितने बरस हुए जाते हैं......

ऋतुएं आती हैं, जाती हैं....
पर मेरी रितु बदलती नहीं....
मैं एक ही धुरि पर टिका रहता हूं.....

यह आसमान और धरा, रंग बदलते हैं.....
पर मैं, एक ही रंग ओढ़े  रहता हूं....

ये सावन, वह बसंत....
और सरद की धूप....
सब मुझे कहते हैं.....
रंग बदलो, हमारे संग बदलो....

अब मैं उन्हें क्या बताऊं....
के, मेरे इस उदास चेहरे के पीछे....

मेरी प्रतीक्षाओं में एक मोहक सुगंध है....
एक आंतरिक वार्तालाप है,
मुग्ध मन्त्रणा जैसा....

और, वही मेरी रितु है.......!!

(c) @ Roop Singh 20/07/22


Saturday, May 29, 2021

पहाड़ से दिन

                         Photo credit...Roop Singh


पहाड़ से दिन


ये पहाड़ से दिन कट ही जाते हें...
इंतजार में तुम्हारे...
पर तुम, नहीं आते...

टकटकी लगा कर देखती है मेरी आँखे..
सूने सूने से रास्तों की तरफ...
पर तुम, नहीं आते...

बसंत की बहारे, बारिशों की रिमझिम..
सरद की गुनगुनी धूप, प्राची की कलरव करती बेला...
और ये गर्मियों की चांदनी रातों में ठंडी हवा के झोंके...
सभी तो बुलाते हें तुम्हें...
मगर तुम हो के, नहीं आते..

और, क्या तुम जानते हो ? ये सब मुझे कितना सताते हें...
मगर देखो ! फिरभी ये पहाड़ से दिन कट ही जाते हें...

क्योंकि, तुम केवल इंतजार नहीं हो...
सांसों की डोर सी हो, जो हृदय से जुड़ी है...
सपनों की तस्वीर सी हो, लगता तो यूं भी है के ! तकदीर सी हो...
मगर तुम हो के, नहीं आते...

ये कोई शिकायत नहीं है...
बस एक संतापी का हाल  है...
और एक लेखक का ख़्याल है...
पहाड़ से दिन तो जैसे तैसे कट ही जाते हें....
कट ही जाते हें.......


(c) @ Roop Singh 29/05/21

Sunday, March 7, 2021

जिंदगी

जिंदगी 


                @ Art work by...Roop Singh 

जिंदगी


कभी हँसता हूं तो हॅंस देती है....
रोता हूं, तो रो देती है...
कभी उड़ता हूं, तो संग-संग उड़ती है...
मेरी ख्वाहिशो में....
जो होता हूं गुम-सुम किसी उलझन में ,
तब तू भी तो उलझी रहती है....

मेरी हर सांस से तू है...
या तेरे होने से मेरी साँसें चलती है...
कौन जाने ये रिश्ता कैसा है, और तू कैसी है....
के! नींद में भी बातें करती है...

किस्मत ने जब भी सताया - रुलाया, तब तब तुझपर ही रोना आता है..
खुदगर्जी और नासमझी तो अक्सर मेरी भी होती है...
पर हर बार शिकायत तुझसे ही होती है...

तूने तो हर आह पर साथ दिया, हर राह पर साथ निभाया है...
जो अब भी न मैं तुझको प्यार करुँ ...
तो ! फिर तो, गलती मेरी है...
फिर तो गलती मेरी है...

(c) @ Roop Singh 01/11/17



स्वपन

     मैंने नींद में एक स्वपन देखा, जो आपके साथ साझा करना चाहता हूं।

     देखा ! एक छोटी चट्टान के नीचे मुझे कुछ असामान्य रूप सा चमकता हुआ दिखाई पड़ा। मुझे लगा कोई माणिक है या कोई अनमोल रतन। लालसा और जिज्ञासा दोनों एक ही समय, मेरे मन में प्रकट हो गई। मुझे लगा, मुझे किसी गुप्त धन की प्राप्ति होने वाली है। और मैं जल्द ही धनवान हो जाऊंगा। उत्साह पूर्वक मैंने चट्टान को उठाने का प्रयास शुरू किया । 
       मुझे एक पक्षी का पांव दिखाई पड़ा। मुझे लगा कोई पक्षी दब गया है जो कि मृत है। मैंने चट्टान को थोड़ा उठाया तभी एक जीवित पक्षी वहां से बाहर निकला। जिस पक्षी का पांव मैंने देखा था वह अभी भी दवा हुआ था और वह भी जीवित था। अब मुझे समझ आया कि जो पक्षी बाहर आया है वह नर पक्षी है। जो की चट्टान के नीचे फंसी हुई अपनी साथी मादा पक्षी को बचाने का प्रयास कर रहा था। 
       मेरे धन की लालसा क्षणभंगुर हो गई। और मैंने अपनी पूरी ताकत लगा कर आखिरकार उस चट्टान को उठा ही दिया। मादा पक्षी घायल और मूर्छित थी। कुछ एक क्षण बाद उसे चेत हुआ।
         अगले ही क्षण में देखता हूं। वहां बहुत से जीव जंतु और पक्षी एकत्र हो चुके थे। तब नर पक्षी ने मेरी ओर इंगित करते हुए, सभी जीव जतुओं और पक्षियों को बताया। के मैंने ही मादा पक्षी का जीवन बचाया है। तब एक हिरन जैसा दिखने वाला जीव। सभी की तरफ से धन्यवाद करने के लिए, मुझसे आ लिपटा। मेरा हृदय करुणा और प्रेम से भर गया। मुझे उस गुप्त धन का कोई भी स्मरण न रहा। मैं प्रेम की भावना में सराबोर था।

      तब मादा पक्षी मेरे हाथों पर आकर बैठी और अपने पांव रंग बिरंगे माणिको जैसे चमकाने लगी।.....!!

यह आखिरी पंक्ति मैंने जोड़ दी है बाकी मेरा स्वपन है जो मैंने देखा।

(c) @ Roop Singh 24/07/22






Thursday, September 10, 2020

गुलाब

 

गुलाब


Art work by...Roop Singh

गुलाब


तनिक दिखाओ तो सही...

मेरी मालन...!

क्या लाई हो आज, दोपहर के खाने में...

और क्यों ? तुम मेरे लिए...

एक कोमल पुष्प, बगिया से तोड़ लाती हो...

रोज़ाना ही....


कहां संभाल पाऊंगा मैं इनकी ख़ुशबू....

तुम ही तुम तो रहती हो...

मेरे हृदय और मस्तिष्क में...


अरे वाह !...'खीर - पुडी'...

कैसे तुम जान जाती हो...

मेरी पसंद ना पसंद...


मेरे प्रीतम...

तुम्हें याद है ना!

तुम्हें गुलाब और इनकी महक कितनी पसंद थी...

के तुम मेरी बगिया के रस्ते आ जाया करते थे...

हर रोज़ ही...


इन्हीं गुलाबों की देन तो है...

हमारा प्रेम प्रसंग और हमारा ये मिलाप...

कहीं ये गुलाब बुरा ना मान जाएं...

इसीलिए मैं रखती हूं इन्हें, हमारी मुलाकातों के बीच...

ताकि महकता रहे हमारा प्रेम...


चलो अब...खीर खालो !!


(c)@ Roop Singh 10/09/20


इत्र

इत्र की महकें तो बहुत देखी..

मोगरे ,गुलाब, चम्पा चमेली की...

कुछ तो पहली बारिश की माटी की सौन्ध जैसी भी...


पर कुछ और भी हैं, जिनका भी कोई जबाब नहीं...

यहाँ मैं तुम्हारी बांहों की बात नहीं करूंगा...


बात करूंगा तुम्हारी यादों की, वो भी बड़ी गज़ब महकतीं हें...

जब भी मैं होता हूं एकांत में, तब तो और भी गज़ब...


वैसे पुरानी किताबें भी अपनी एक अलग सुगंध रखती हैं...

जिनका भी कोई मुकाबला नहीं है....


(c) @ Roop Singh 03/08/21

Wednesday, August 12, 2020

छतरी

 छतरी



वो टूटी हुई छतरी...
मेरे, मर चुके दादा की...

वो बड़ी सी छतरी...
कपास के सूती कपड़े वाली...
काले रंग की छतरी...
मेरे दादा की...

छड़ी जैसे डंडे वाली...
वो फटी हुई छतरी...
जिसके चाको पर लगी हैं पातियां ....
वो पुरानी सी छतरी...
मेरे दादा की...

जिसकी तिल्लियां अब भी, खुलने को आतुर दिखाई पड़ती हैं...
जिन्हें देखकर, मुझे लगता है....
जब ठंड के किसी एक दिन, भयंकर बारिश होगी....
तब ये छतरी ! ....
मेरे, मर चुके दादा की छतरी...

मुझे जरूर बचा लेगी...

ऐसे ही थोड़े संभाल कर रखी होगी...
मेरे पिता ने...

(c) @ Roop Singh 12/08/20


Art work by...Roop Singh


पुरानी चीजें


    घर मैं बहुत सी पुरानी चीजों को सहेज कर रखने के पक्ष में मैं नहीं हूं। हमें वर्तमान में जीना चाहिए। भविष्य को गढ़ना चाहिए। और अपने स्तर पर भी कुछ खास ऐसा करना चाहिए। जिसे सहेजा जाए। कुल मिला कर मैं कुछ खास और सृजनात्मक चीजों को सहेज कर रखने के पक्ष में हूं। अगर हम भी कुछ अनूठा करेगें तो चाहेंगे की उसे सहेजा जाए। आने वाली पीढ़ी भी उसे सहेजे। ऐसे ही जो हमारे बुजुर्ग कुछ खास करके गए, हमें उनके सम्मान में और भावी पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत के लिए उनके किए गए कामों या उनके द्वारा छोड़ी गई कुछ खास वस्तुओं को जरूर संभालना चाहिए।
            ये उचित भी है। एक तो जो अपने बुजुर्ग हमसे दूर जा चुके हैं, इन चीजों के माध्यम से वे हमारे पास ही जान पड़ते है। दूसरा उनके प्यार और आशीर्वाद की महक बनी रहती है। पुरानी वस्तु या काम की एक अलग कीमत भी होती है। और एक अलग और बेजोड़, हृदय को छूने वाला जुड़ाव भी। और पुरानी चीजें हमारे अंदर भी एक सकारात्मक ऊर्जा भर्ती है , हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है । सच पूछो ! तो यही पुरानी चीजें और पुराने काम चाहे वो साहित्य में हो या कला की किसी विद्या में।  ये सब हमें कलात्मक बनाते है और अपने अनुभव हमें प्रदान करते है। हमें भी उनकी मेहनत और उनके खोजे तरीकों या उपकरण आदि का सम्मान करना चाहिए। सही तरीका यही है कि , हम उनके काम को ना केवल सही ढंग से सहेजें - सराहें, साथ में उसे देखें भी, समझे भी,  सुने भी और उससे कुछ सीखें और कुछ नया करें।

Roop Singh 06/09/20   11:30 AM

Saturday, June 6, 2020

सावन

सावन

Photo credit..Roop Singh

सावन


कुछ समय पहले कि ही बात है..
जब ये 'सावन', आया ना था..
ये पहाड़ , कितने उजाड़ और विरान थे..
इनकी सुलगती ऊंचाइयों को देख, डर लगता था..

और अब ! सावन के आने से..
क्या गजब की छा गई है, हरियाली इनपर..
रोज़ ही लगती है, रिम-झिम झड़ी फुहारों की..
और फूट आएं है चट्टानों से, झरने कितने..

लगता है जैसे ! कोई गीत छिड़ने वाला है..
वातावरण में, तत्क्षण ही.....

अब तो,  इन पहाड़ों केेे चरम शिखर पर चढ़ जाने को जी चाहता है..

एक अस्पष्ट ध्वनि सुनाई सी पड़ती है...
नूपुरों की, हर एक दिशा से...
 
 स्मृति की बेल पर जैसे, स्वर्ण पुष्प खिल रहे हें...
हर एक गरज के साथ. ...

और झूम - झूमकर बरस रहा है, सावन....
नाच रहा है, ये मयूरा मन...!

बस ! अब एक ही बात उठ रही  है .....!
हिया से. ..!

के, हाय ! ये सावन की रुत  चली ना जाए..!
चली ना जाए , कहीं 'ये रुत....!!

'ये रुत,  सावन की ....!!

(C) @ Roop Singh  19/06/2015




कब तक ना आती आखिर


धूप थी सह गया..........!
अंधेरों मे भी रह गया...!!

पर ये बारिश क्या आई. !
तेरी यादों में वह गया....!!

(c) @ Roop Singh 16/ 06/2003

बरस मेरी रूह पर 


मैं बरसो से हूं विरान ,  किसी उजाड़ बंजर कि तरह. ...!

तू बरस........!!

तू बरस. .......!!
मेरी रूह पर किसी,  सावन के मंजर कि तरह. ..........!!

(c) @ Roop Singh 18/06/2003






बदलाव

      जिंदगी कभी एक जैसी नहीं रहती। वो हर पल बदलती रहती है।चेहरे की लकीरों में, रिश्तों की गांठों में, अटकलों में, आशंकाओं में, सोचने समझने की शक्ति में, देह की गर्मी में, आवाज़ की गरज़ और लरज़  में, टूटते बंधनों में, छूटते सपनों में जिंदगी बदलती ही रहती है। 

      जिंदगी अपने प्रयासों में भी बदलती है। जब हम एक सकारात्मक दृष्टिकोण से जिंदगी में आगे बढ़ते है। तब हम बेहतर शिक्षा ग्रहण करते है, हम अपने जीने का तरीका विकसित करते है। जिसमें हम अपने बोलने, चलने , खाने , सोने आदि से लेकर व्यवहार और सामाजिक ढंग में संतुलित सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं। हम एक आंतरिक दृष्टि भी प्राप्त कर पाते है। जिसकी सहायता से, हम दुख़ - सुख में, अच्छे - बुरे समय में, प्रकृति के नियमों में, अपने सपनों में , अपनी आस्था और भक्ति में, अपनी आशाओं और आशंकाओं में, अपने अंदरुनी वार्तालाप में और अन्य परिस्थितियों में भी, एक सही सारांश निकाल पाते है। और तब हम जीवन के हर जाते हुए क्षण को बेहतर जी पाते हैं। निश्चय करने और संकल्प को साधने के लिए तैयार हो पाते है।
 
         हमारा दुःख हमें कुछ सिखा कर जाता  है। तो हमारी उपलब्धि हमारे संघर्ष को सराहती है। हमें खुशी प्रदान करती है। बदलाव नियति है, बदलाव समय के बहने का साक्ष्य है। हमें बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। समय के साथ आगे बहते रहने के लिए।
     बदलाव ना केवल दुःख जीवन मे लाता है, बदलाव सुख़ भी जरूर लाता है। वर्तमान इसी तरह भविष्य की ओर प्रगति करता है । 

(c) @ Roop Singh 19/06/2015

Friday, May 8, 2020

अर्थ

अर्थ

Photo credit...@ Roop Singh



अर्थ


उम्र बिताई अबतक, हेर-फेर में.....
के !  सुलझ जाएगी जिन्दगी.....
मगर ! उलझा ही रहा हमेशा.....
बिना काम और बिना लक्ष्य के....
छोटी - छोटी सी बातों में....
जिनका कोई अर्थ, था ही नहीं जीवन में....
और ना कभी हो सकता था......

बहुत सोच विचार किया....
के ! कब पसंद था मुझे ?.....
इस तरह उलझे रहना......
बिना काम और बिना लक्ष्य के.......
छोटी - छोटी सी बातों में.....
जिनका कोई अर्थ, हो नहीं सकता था.....
मेरे इस बहुमूल्य जीवन में.....

सो आज ! अपने अधूरे अनुभव से......
पंहुचा हूं इस निष्कर्ष पे....
सहज और सुलझे रहने से ही.......
होता है पूर्ण ! अर्थ इस जीवन का....
और,  सहज और सुलझे रहने से ही होती है सुगम....
किसी लक्ष्य की प्राप्ति .....

और इतने सब, अंदरूणी उथल - पुथल  के बाद.....
भरता हूं, एक लम्बी सांस.....
पाता हूं स्वयं को सहज और सुलझा.....

जैसे : खुल गए हो, ज्ञान के चक्षु.....
दिखता है , पूर्ण होते हुए.....
अर्थ ! इस बहुमूल्य जीवन का....

और समझता हूं....
यही मानव प्रकृति का प्रतिपालन है...... 


(c) @ Roop Singh  16/02/2016


Photo credit..@ Roop Singh


   मंथन


       ये बहुत महत्व रखता है, के जीवन के प्रति हमारा नजरिया और व्यवहार कैसा है। हमे परिश्रमी, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, करूणावान, सत्यवान, देशभक्त, परहितकारी, मिलनसार, पर्यावरण रक्षक और एक अच्छा व्यक्ति और नागरिक होने के लिए जिन सही आचरणों की आवश्यकता पड़े उन्हें अपनाना चाहिए। यही उत्तम मार्ग है एक सुखमय जीवन और समाज के लिए। ये सभी की जिम्मेदारी भी है।

     पर व्यक्तिगत रूप से इंसान की प्रकृति ऐसी है । कि ! उसे अपने आप में शांत और संतुष्ट होने की एक चाह तो होती है। पर वह हमेशा भटकाव और अस्थिरता का चुनाव ज्यादातर करता है। इसके अनेक कारण वर्णित है किताबों, काव्यों, ग्रंथो आदि में। मुख्य वजह उसकी अपनी लालसा हो सकती है और आज के दौर में तो इंसान का जो व्यावसायिक आधुनिकरण हुआ है, उसके चलते कई और कारण भी जुड़ गए है। चाहे ना चाहे भी इंसान उलझनों को न्यौता दे देता या उनमें फंस जाता है। जंहा उसे मानसिक तनाव से भी गुजरना होता है। और कई बार अवसाद इंसान के दिल दिमाग में घर कर जाता है। इसकी भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अवसाद का  बुरा प्रभाव शरीर पर भी होता है। दिनचर्या , खानपान  , निंद्रा आदि में होने वाले बदलावों के कारण।

           इसलिए इंसान को चाहिए कि सुलझा हुआ रहे, सहज रहे और सरल रहने की कोशिश करे। अब सवाल उठता है कैसे ?
     
    तो देखिए! इंसान की मूल जरूरतें इतनी भी नहीं की जितनी चीजों के पीछे आज इंसान भागता है। और एक ऐसे चक्र में स्वयं को फसा लेता है। जहां वह स्वयं को जीना भूल जाता है, समय का सही उपयोग किए बिना उसे गुजरने देता है। इंसान होने की मौलिकता से  कट जाता है। यहां बदलाव लाने की बहुत गुंजाइश है और जिन्हे लाना चाहिए। केवल भाग्य का ठीकरा फोड़ कर स्वयं को अलग नहीं किया जा सकता,  इस बात से जो असल में इंसान के जीवन  के लिए सहायक है।

    इसलिए बहुत जरूरी है इंसान को अपनी सही क्षमता और पसंद की पहचान करके, उसके अनुरूप ही काम और लक्ष्य का चुनाव करना चाहिए। ताकि काम, तनाव का कारण कम बने।  और जब काम पसंद का होगा तो काम में मन भी लगेगा ।

     साथ ही  अपने रिश्तों को, परिवार को , मित्रो आदि को भी समय देना चाहिए जिससे ना केवल प्रेम की प्रगाड़ता बढ़ती है, साथ ही अकेलेपन के अवसाद से भी इंसान बच जाता है । और आत्मबल भी बढ़ता है।
   
         यहां सुलझे और सहज रहने से यही पर्याय है। की अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए। सरल रहे, खुश रहे, मुस्कुराते रहे ।
तर्क और बातों का कोई अंत नहीं । सुख और दुख एक हिस्सा है जीवन का । दोनों ही स्थितियों में एक सुलझा हुआ इंसान ही सुख का सही आनंद ले सकता है और दुःख से उबर सकता है। जीवन बहुत अनमोल और महत्वपूर्ण है। इसका सम्मान होना ही चाहिए।

Roop Singh 10/05/2020


Tuesday, April 7, 2020

धीरज

धीरज

Art by..Roop Singh



धीरज 

सूदूर ब्रह्माण्ड से आती एक किरण...
प्रकाश की....
स्याह नीली...

जैसे किसी नीले तारे से,
फूटकर आयी हो....

हृदय को चीरती है...
रक्त के ताप को करती है , शीतल !....

शारीरिक गतिशीलता को लेजाती है,
अर्दमूर्छित अवस्था में....

पूर्ण प्रयास से , कर्ण !
उस ध्वनि के द्वार पर पहुंचते है...
जो अब !
विवेक पटल तक गुंजायमान हो चली है...

कहती है...!

" धीरज रखो , वत्स ! "
" सयंम बरतो "

"समय की डोर कच्ची है ....
रक्त में बनाए रखो शीतलता ....
कहीं कर ना बैठना प्रहार, 
बरती समय पर ...."

"ध्यान रहे , ध्यान रहे"

"देखो ! क्षितिज की ओर उस ' नील ' को देखो !..."
"भविष्य ने जनम लिया है,  इसी क्षण "

"तुम्हारे लिए "
"तुम्हारे लिए "......

c@ Roop Singh 30/06/2017


      जीवन बड़ी उतार - चढ़ाव वाली यात्रा है। बिना उतार - चढ़ाव का जीवन इतना सरल हो सकता है कि, मनुष्य का बौद्धिक विकास ही न हो पाए। इसलिए भी जीवन में सुख के साथ दुःख और संघर्ष का होना भी महत्व रखता है। यहां मेरी कोई ऐसी मंशा नहीं है कि ईश्वर हमे दुःख भी दे। पर जो नियति मे लिखा होगा , वो तो संभवतः ही भोगना पड़ेगा।
    एक नैतिक और सामाजिक जीवन के लिए मूल्यों का होना बहुत आवश्यक है। मूल्य जैसे : सामाजिक मूल्य , सांसारिक मूल्य, पारिवारिक मूल्य और व्यक्तिगत मूल्य, और भी। ये सब मूल्य ही एक कल्याणकारी संरचना बना सकते है । व्यक्ति के अंदर भी और बाहर भी।
       जैसे कि मेरी उपरोक्त कविता का शीर्षक है "धीरज" । यह भी एक मूल्य ही है। जो कि जीवन में बहुत महत्व रखता है। जब जब धीरज नहीं रखा जाता तब तब भूल होने की संभावना अधिक रहती है।

      कई बार समय हमे धीरज रखने को कहता है। क्योंकि धीरज रखने से ना केवल वर्तमान में शांति और स्थिरता की संभावना बनती है, बल्किन एक अच्छा भविष्य भी निर्धारित होता है।

    रही बात कविता की , तो वह कई बार बहुत कम शब्दों में भी बहुत कुछ कह जाती है। जिसपर गहराई से विचार किया जा सकता है।


विचार

       विचार या नए विचार एक खूबसूरत देन है  इश्वर की, प्रकृति की या नियति की। एक विचारक, लेखक, कवि , कलाकार, अनुसंधानकर्ता या किसी के भी लिए, एक सकारात्मक विचार एक सुगंधित फूल सा होता है। जो अपनी महक से एक अद्वितीय आनंद प्रदान करता। अपनी मंत्रणा में डूबे हुए प्राणी को कई दृष्टिकोण देता है । विचार में कितने ही गोते लगाते रहो उसके अनमोल मोती समाप्त नहीं होते। उसे कितना ही मथो वह मूल्यवान भेटें देता रहता है। उसकी गहराई की थाह पाताल तक नहीं लगती। उसकी सीमा का कोई अंत नहीं होता। वह सम्पूर्ण अवसर देता है अपने वन - उपवन में विचरण और भ्रमण करने का। अपने आकाश में दूर - सूदूर तक झांकने और डोलने का।

      देखा जाए तो मनुष्य द्वारा निर्मित या लिखित  हर किसी चीज या लेख की उत्पति पहले एक विचार के रूप में ही हुई । वह स्वपन से आया हुआ भी हो सकता है। 

     एक फूल की जिस तरह अल्पआयु होती है। उस तरह विचार भी बहुत जल्द लोप हो सकता है। उसे संग्रहित करना आवश्यक और चुनौतीपूर्ण है।

     नए विचारों के आने से वह दब जाता है या लुप्त हो जाता है। अपनी स्मृति से उसे निकालकर फिरसे वही आनंद और सुगंध प्राप्त करना थोड़ा कठिन हो सकता है । इसलिए बेहतर यही होगा कि उसे पहले ही चरण में गृहण किया जाना चाहिए ।

        आविष्कार की नींव का पहला पत्थर विचार ही होता है।

Friday, March 20, 2020

वेदना

  वेदना



 मेरी प्रिय....
अब चाहे मैं कितना ही भटकता रहूं ....
चाहे मुझे कितने ही जनम मिले ....
क्या जाने ?
मेरी मुलाकात, अब तुमसे कब हो ....
या ना भी हो .....

ईश्वर जानता है ....
और, जानती हो तुम भी ....
हमारे सच्चे रिश्ते के हर छोटे - बड़े भाग को ....
के ! कितना ईमानदार रहे हम .....
एक दूसरे के लिए ....

आज तुम जो , मेरा ये भ्रम ....
तोड़कर चली गई हो ....
के ! मैं समझता था ....
तुम और मैं एक साथ रहेंगे हमेशा ....
मिट्टी से निर्मित इस देह में ...
मगर ये हो ना सका .....

शिकायत तो है ! तुमसे ....
और विधाता से भी ....
पर ! मैं भी जानता हूं ....
जीवन के चक्र का नियम ....
इसलिए ! पोंछ लेता हूं आंसू अपने .....
अपने ही हाथों से ....

हृदय की वेदना और हृदय का प्रेम ....
अमर रहेगा , आत्मा की तरह ....
जो जोड़े रखेगा मुझे तुमसे ....
हमेशा ! .....
ये वादा है तुमसे ....

मेरी प्रिय ....

और ये भी वादा है .....
चाहे  पुनर्जन्म की कहानियां ...
सच हो या ना हो ....
फिरभी, मैं भटकता रहूंगा ....
तुम्हारी यादों में ....
अपनी प्राथनाओं में ....
और अपने हृदय की वेदनाओं में ....
 तुम देख लेना .....

c@   Roop Singh 14/05/2016



कहावत है " जरूरत आविष्कार की जननी होती है " ।  सही है।  ऐसे ही विचार या किसी भी लेखन सामग्री का भी स्रोत होता है ( मेरा अनुभव ) ।  जो  कहीं से भी आया हुआ हो सकता है । 
ऐसे ही जो,  "वेदना"  मेरी कविता है,  उसका स्रोत मैं आपसे साझा कर रहा हूं ।

हुआ यूं के मैंने अपने एक मित्र से एक दिन अचानक , उसका हालचाल पूछने के लिए संपर्क किया । तब ! वो बहुत दुखद दिन था उसका ।  उसकी पत्नी का उसी समय देहांत हुआ था, एक दुर्घटना में।
और उसने अपनी आपबीती मुझे बताई । तब मुझे समझ नहीं आया , के अब मैं उसके साथ क्या बात करूं।
उसका दर्द मेरे भीतर घुस गया । और फिर मेरे द्वारा इस कविता ने जन्म लिया। जो कि मैं उस मित्र से भी आजतक साझा ना कर पाया।
ये कविता मैंने तब रोते हुए लिखी, यही सच है।